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Tuesday, April 9, 2019

परमात्मा भाग-11

 भगवान श्री कृष्ण भगवत गीता में  कहते हैं कि :-

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।

भावार्थ यह है कि भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को अन्तिम बात बताते हुए कहते हैं कि है अर्जुन तू समस्त प्रकार के धर्मो का परित्याग करके पूर्ण रूप से केवल मेरी ही शरण में आजा मैं तेरे समस्त कर्मो को ही समाप्त करके तेरा उद्धार कर दुंगा तू चिन्ता मत कर।

 जो भक्त पूर्ण रूप से   भगवान की शरण में आ जाता है भगवान ऐसे अपने प्रिय भक्त की स्वयं देखरेख करते हैं और सदैव उसकी रक्षा करते हैं। इसकी पुष्टि गीता के इस श्लोक से होती है -

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम।।

भगवान कहते हैं कि जो भक्त अनन्यरूप से मेरी भक्ति करता है मैं उसकी सब तरह से रक्षा करता हूँ उसको फिर कभी मायाजाल में नहीं फसंने देता सदा के लिए उसका उद्धार कर देता हूँ।
                 
ईश्वर की कृपा प्राप्ति हेतु शरणागति ही वो ब्रह्मास्त्र है जिसके बिना जीव ईश्वर प्राप्ति का अपना लक्ष्य नहीं पा सकता । शरणागति से ईश्वर कृपा प्राप्त होगी और ईश्वर कृपा से ही जीव की मायानिवृत्ति होगी और मायानिवृत्ति होने पर तत्काल  लक्ष्य प्राप्ति सम्भव है। ईश्वर प्राप्ति का यही एक सही साधन है और वो है भक्ति मार्ग। 

परमात्मा भाग-10

भगवत गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं -

मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्षयसि।।

भावार्थ है कि भगवान कहते हैं कि है अर्जुन तू पूर्णरूप से अपना मन मुझमें लगा दे तब तू मेरी कृपा से सम्पूर्ण विघ्नों से आसानी से तर जायेगा और यदि तू अहंकार के कारण मेरी बात नहीं सुनेगा तो निश्चित रूप से तेरा पतन हो जायेगा।

आगे  फिर भगवान शरणागति की  ही बात कहते हैं -

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्सयसि  शाश्वतम्।।

भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि हे अर्जुन तू सर्वभाव से मेरी ही शरणागति को प्राप्त हो जा ऐसा करने से मेरी कृपा से अविनाशी परमपद अर्थात मेरे लोक परमधाम को प्राप्त कर लेगा जहां से फिर कोई लोटकर वापस नहीं आता।

जीवात्मा के द्वारा पूर्णरूप से परमात्मा के शरणागत होने पर ही   परमात्मा जीवात्मा पर कृपा करते हैं।  परमात्मा का एक रूप न्यायाधीश  है और एक रूप कृपालु है। न्यायाधीश के रूप में जीवात्मा के द्वारा किये गये कर्मो के विधान का   फैसला करते हैं और तद्नुसार कर्मो का फल देते हैं। कृपालु के रूप में कर्मविधान ही समाप्त हो जाता है, जिस जीवात्मा पर प्रभु कृपा करते हैं उस जीवात्मा पर उसके द्वारा किये गये कर्म व कर्मफल का कोई असर नहीं होता  उसके कर्म अकर्म में बदल जाते हैं। भगवत गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि -

क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति।।

भावार्थ यह है कि भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि हे अर्जुन जो मनुष्य पूर्णरूप से मेरी शरण हो जाता है उस पर मैं कृपा करता हूँ और वो मेरी कृपा के फलस्वरूप तत्काल उसी क्षण मेरा भक्त ( धर्मात्मा) हो जाता है और तत्काल निरन्तर रहने वाली सुख शान्ति को प्राप्त हो जाता है। हे कुन्तीनन्दन अर्जुन निडर होकर  यह घोषणा कर दो कि मेरे शरणागत भक्त का पतन नहीं हो सकता क्योंकि वो पूर्णरूप से मेरी शरण में है। 

झगड़ा पति पत्नि का

पति ने पत्नी को किसी बात पर तीन थप्पड़ जड़ दिए, पत्नी ने इसके जवाब में अपना सैंडिल पति की तरफ़ फेंका, सैंडिल का एक सिरा पति के सिर को छूता हुआ निकल गया।

मामला रफा-दफा हो भी जाता, लेकिन पति ने इसे अपनी तौहिन समझा, रिश्तेदारों ने मामला और पेचीदा बना दिया, न सिर्फ़ पेचीदा बल्कि संगीन, सब रिश्तेदारों ने इसे खानदान की नाक कटना कहा, यह भी कहा कि पति को सैडिल मारने वाली औरत न वफादार होती है न पतिव्रता।

इसे घर में रखना, अपने शरीर में मियादी बुखार पालते रहने जैसा है। कुछ रिश्तेदारों ने यह भी पश्चाताप जाहिर किया कि ऐसी औरतों का भ्रूण ही समाप्त कर देना चाहिए।

बुरी बातें चक्रवृृद्धि ब्याज की तरह बढ़ती है, सो दोनों तरफ खूब आरोप उछाले गए। ऐसा लगता था जैसे दोनों पक्षों के लोग आरोपों का वॉलीबॉल खेल रहे हैं। लड़के ने लड़की के बारे में और लड़की ने लड़के के बारे में कई असुविधाजनक बातें कही।


मुकदमा दर्ज कराया गया। पति ने पत्नी की चरित्रहीनता का तो पत्नी ने दहेज उत्पीड़न का मामला दर्ज कराया। छह साल तक शादीशुदा जीवन बीताने और एक बच्ची के माता-पिता होने के बाद आज दोनों में तलाक हो गया।

पति-पत्नी के हाथ में तलाक के काग़ज़ों की प्रति थी। दोनों चुप थे, दोनों शांत, दोनों निर्विकार।
मुकदमा दो साल तक चला था। दो साल से पत्नी अलग रह रही थी और पति अलग, मुकदमे की सुनवाई पर दोनों को आना होता। दोनों एक दूसरे को देखते जैसे चकमक पत्थर आपस में रगड़ खा गए हों।

दोनों गुस्से में होते। दोनों में बदले की भावना का आवेश होता। दोनों के साथ रिश्तेदार होते जिनकी हमदर्दियों में ज़रा-ज़रा विस्फोटक पदार्थ भी छुपा होता।

लेकिन कुछ महीने पहले जब पति-पत्नी कोर्ट में दाखिल होते तो एक-दूसरे को देख कर मुँह फेर लेते। जैसे जानबूझ कर एक-दूसरे की उपेक्षा कर रहे हों, वकील औऱ रिश्तेदार दोनों के साथ होते।

दोनों को अच्छा-खासा सबक सिखाया जाता कि उन्हें क्या कहना है। दोनों वही कहते। कई बार दोनों के वक्तव्य बदलने लगते। वो फिर सँभल जाते। अंत में वही हुआ जो सब चाहते थे यानी तलाक ................

पहले रिश्तेदारों की फौज साथ होती थी, आज थोड़े से रिश्तेदार साथ थे। दोनों तरफ के रिश्तेदार खुश थे, वकील खुश थे, माता-पिता भी खुश थे।

तलाकशुदा पत्नी चुप थी और पति खामोश था।
यह महज़ इत्तेफाक ही था कि दोनों पक्षों के रिश्तेदार एक ही टी-स्टॉल पर बैठे , कोल्ड ड्रिंक्स लिया। यह भी महज़ इत्तेफाक ही था कि तलाकशुदा पति-पत्नी एक ही मेज़ के आमने-सामने जा बैठे।

लकड़ी की बेंच और वो दोनों .......
''कांग्रेच्यूलेशन .... आप जो चाहते थे वही हुआ ....'' स्त्री ने कहा।
''तुम्हें भी बधाई ..... तुमने भी तो तलाक दे कर जीत हासिल की ....'' पुरुष बोला।

''तलाक क्या जीत का प्रतीक होता है????'' स्त्री ने पूछा।
''तुम बताओ?''
पुरुष के पूछने पर स्त्री ने जवाब नहीं दिया, वो चुपचाप बैठी रही, फिर बोली, ''तुमने मुझे चरित्रहीन कहा था....
अच्छा हुआ.... अब तुम्हारा चरित्रहीन स्त्री से पीछा छूटा।''
''वो मेरी गलती थी, मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था'' पुरुष बोला।
''मैंने बहुत मानसिक तनाव झेला है'', स्त्री की आवाज़ सपाट थी न दुःख, न गुस्सा।

''जानता हूँ पुरुष इसी हथियार से स्त्री पर वार करता है, जो स्त्री के मन और आत्मा को लहू-लुहान कर देता है... तुम बहुत उज्ज्वल हो। मुझे तुम्हारे बारे में ऐसी गंदी बात नहीं करनी चाहिए थी। मुझे बेहद अफ़सोस है, '' पुरुष ने कहा।

स्त्री चुप रही, उसने एक बार पुरुष को देखा।
कुछ पल चुप रहने के बाद पुरुष ने गहरी साँस ली और कहा, ''तुमने भी तो मुझे दहेज का लोभी कहा था।''
''गलत कहा था''.... पुरुष की ओऱ देखती हुई स्त्री बोली।
कुछ देर चुप रही फिर बोली, ''मैं कोई और आरोप लगाती लेकिन मैं नहीं...''

प्लास्टिक के कप में चाय आ गई।
स्त्री ने चाय उठाई, चाय ज़रा-सी छलकी। गर्म चाय स्त्री के हाथ पर गिरी।
स्सी... की आवाज़ निकली।
पुरुष के गले में उसी क्षण 'ओह' की आवाज़ निकली। स्त्री ने पुरुष को देखा। पुरुष स्त्री को देखे जा रहा था।
''तुम्हारा कमर दर्द कैसा है?''
''ऐसा ही है कभी वोवरॉन तो कभी काम्बीफ्लेम,'' स्त्री ने बात खत्म करनी चाही।

''तुम एक्सरसाइज भी तो नहीं करती।'' पुरुष ने कहा तो स्त्री फीकी हँसी हँस दी।
''तुम्हारे अस्थमा की क्या कंडीशन है... फिर अटैक तो नहीं पड़े????'' स्त्री ने पूछा।
''अस्थमा।डॉक्टर सूरी ने स्ट्रेन... मेंटल स्ट्रेस कम करने को कहा है, '' पुरुष ने जानकारी दी।

स्त्री ने पुरुष को देखा, देखती रही एकटक। जैसे पुरुष के चेहरे पर छपे तनाव को पढ़ रही हो।
''इनहेलर तो लेते रहते हो न?'' स्त्री ने पुरुष के चेहरे से नज़रें हटाईं और पूछा।
''हाँ, लेता रहता हूँ। आज लाना याद नहीं रहा, '' पुरुष ने कहा।

''तभी आज तुम्हारी साँस उखड़ी-उखड़ी-सी है, '' स्त्री ने हमदर्द लहजे में कहा।
''हाँ, कुछ इस वजह से और कुछ...'' पुरुष कहते-कहते रुक गया।
''कुछ... कुछ तनाव के कारण,'' स्त्री ने बात पूरी की।

पुरुष कुछ सोचता रहा, फिर बोला, ''तुम्हें चार लाख रुपए देने हैं और छह हज़ार रुपए महीना भी।''
''हाँ... फिर?'' स्त्री ने पूछा।
''वसुंधरा में फ्लैट है... तुम्हें तो पता है। मैं उसे तुम्हारे नाम कर देता हूँ। चार लाख रुपए फिलहाल मेरे पास नहीं है।'' पुरुष ने अपने मन की बात कही।

''वसुंधरा वाले फ्लैट की कीमत तो बीस लाख रुपए होगी??? मुझे सिर्फ चार लाख रुपए चाहिए....'' स्त्री ने स्पष्ट किया।
''बिटिया बड़ी होगी... सौ खर्च होते हैं....'' पुरुष ने कहा।
''वो तो तुम छह हज़ार रुपए महीना मुझे देते रहोगे,'' स्त्री बोली।
''हाँ, ज़रूर दूँगा।''
''चार लाख अगर तुम्हारे पास नहीं है तो मुझे मत देना,'' स्त्री ने कहा।
उसके स्वर में पुराने संबंधों की गर्द थी।

पुरुष उसका चेहरा देखता रहा....
कितनी सह्रदय और कितनी सुंदर लग रही थी सामने बैठी स्त्री जो कभी उसकी पत्नी हुआ करती थी।
स्त्री पुरुष को देख रही थी और सोच रही थी, ''कितना सरल स्वभाव का है यह पुरुष, जो कभी उसका पति हुआ करता था। कितना प्यार करता था उससे...

एक बार हरिद्वार में जब वह गंगा में स्नान कर रही थी तो उसके हाथ से जंजीर छूट गई। फिर पागलों की तरह वह बचाने चला आया था उसे। खुद तैरना नहीं आता था लाट साहब को और मुझे बचाने की कोशिशें करता रहा था... कितना अच्छा है... मैं ही खोट निकालती रही...''

पुरुष एकटक स्त्री को देख रहा था और सोच रहा था, ''कितना ध्यान रखती थी, स्टीम के लिए पानी उबाल कर जग में डाल देती। उसके लिए हमेशा इनहेलर खरीद कर लाती, सेरेटाइड आक्यूहेलर बहुत महँगा था। हर महीने कंजूसी करती, पैसे बचाती, और आक्यूहेलर खरीद लाती। दूसरों की बीमारी की कौन परवाह करता है? ये करती थी परवाह! कभी जाहिर भी नहीं होने देती थी। कितनी संवेदना थी इसमें। मैं अपनी मर्दानगी के नशे में रहा। काश, जो मैं इसके जज़्बे को समझ पाता।''

दोनों चुप थे, बेहद चुप।
दुनिया भर की आवाज़ों से मुक्त हो कर, खामोश।
दोनों भीगी आँखों से एक दूसरे को देखते रहे....

''मुझे एक बात कहनी है, '' उसकी आवाज़ में झिझक थी।
''कहो, '' स्त्री ने सजल आँखों से उसे देखा।
''डरता हूँ,'' पुरुष ने कहा।
''डरो मत। हो सकता है तुम्हारी बात मेरे मन की बात हो,'' स्त्री ने कहा।
''तुम बहुत याद आती रही,'' पुरुष बोला।
''तुम भी,'' स्त्री ने कहा।
''मैं तुम्हें अब भी प्रेम करता हूँ।''
''मैं भी.'' स्त्री ने कहा।

दोनों की आँखें कुछ ज़्यादा ही सजल हो गई थीं।
दोनों की आवाज़ जज़्बाती और चेहरे मासूम।
''क्या हम दोनों जीवन को नया मोड़ नहीं दे सकते?'' पुरुष ने पूछा।
''कौन-सा मोड़?''
''हम फिर से साथ-साथ रहने लगें... एक साथ... पति-पत्नी बन कर... बहुत अच्छे दोस्त बन कर।''

''ये पेपर?'' स्त्री ने पूछा।
''फाड़ देते हैं।'' पुरुष ने कहा औऱ अपने हाथ से तलाक के काग़ज़ात फाड़ दिए। फिर स्त्री ने भी वही किया। दोनों उठ खड़े हुए। एक दूसरे के हाथ में हाथ डाल कर मुस्कराए। दोनों पक्षों के रिश्तेदार हैरान-परेशान थे। दोनों पति-पत्नी हाथ में हाथ डाले घर की तरफ चले गए। घर जो सिर्फ और सिर्फ पति-पत्नी का था।।

पति पत्नी में प्यार और तकरार एक ही सिक्के के दो पहलू हैं जरा सी बात पर कोई ऐसा फैसला न लें कि आपको जिंदगी भर अफसोस हो।।

परमात्मा भाग-9

ईश्वर ही अपनी कृपा से जीव को त्रिगुणात्मक माया प्रकृति से बन्धन मुक्त कर सकते हैं अन्य किसी दूसरी शक्ति में सामर्थ्य नहीं है और न  ही जीव अपने बल पर साधना करके इस माया से बन्धनमुक्त हो सकता है इसके अतिरिक्त किसी सन्त महात्मा में भी ऐसी सामर्थ्य नहीं है जो इस असम्भव कार्य को सम्भव कर सके। फिर ऐसा क्यों कहते हैं कि ईश्वर प्राप्ति में गुरु का होना अनिवार्य है, वो इस लिये कहते हैं कि वास्तविक मायातीत महापुरुष  इस प्रक्रिया से गुजरे हुए होते हैं उन्हें इस मार्ग का पूर्ण ज्ञान होता है और उसी तरह का ज्ञान वे हमें समझाते हैं। अब शिष्य के ऊपर निर्भर है कि वो उस मार्ग कितना चलता है यदि साधक गुरु के बताये मार्ग पर नहीं चलेगा तो ऐसी दशा में स्वयं जगदगुरु ब्रह्मा जी भी उस शिष्य का कुछ नहीं करसकते। केवल ईश्वर की कृपा से ही ईश्वर को जान सकते हैं, प्राप्त करसकते हैं, इस सम्बन्ध में  रामचरित्र मानस में तुलसीदास जी ने लिखा है -

राम कृपा बिनु सुनु खगराई।
जानि न जाय राम प्रभुताई।।

अब तो केवल परमात्मा की कृपा कैसे प्राप्त हो इस सम्बन्ध में ही बिचार करना है। ईश्वर कृपा प्राप्ति हेतु जीवो ने अलग अलग प्रकार के तरीके अपनाये परन्तु कामयाबी नहीं  मिली क्योंकि वे सभी तरीके सटीक नहीं थे। हमने सबकुछ किया परन्तु भगवान से प्यार नहीं किया, प्रेम से ही भगवान भक्त के वश में होजाते हैं । रामचरित्र मानस में लिखा है कि -

रामहु केवल प्रेम प्यारा।
जानलेहु जो जाननि हारा।।

 प्रेम भक्ति के सामने ब्रह्मज्ञान बहुत पीछे है।रामचरित्र मानस में एक प्रसंग आता है जब विश्वामित्र जी के साथ राम और लक्ष्मण धनुषयज्ञ देखने राजा जनक के यहां जाते हैं और जब राजा जनक जो बहुत बड़े ब्रह्मज्ञानी थे उन्हें विदेह कहा जाता है, जैसे ही जनक ने राम लक्ष्मण को देखा तत्काल ब्रह्मज्ञान गायब हो गया और प्रेमानन्द उत्पन्न होगया और तत्काल जनक विश्वामित्र जी से कहने लगे -

इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा।
बरबस ब्रह्म सुखहि मन त्यागा।।

एक पशु होता है जिसे हम गधा कहते हैं उस पर भी परमात्मा यदि अपनी कृपा करदे तो वह गधा भी परमात्मा को जान सकता है, प्राप्त कर सकता है। अब ईश्वर की कृपा कैसे प्राप्त हो इस पर कुछ विचार करते हैं। परमात्मा की कृपा प्राप्ति हेतु परमात्मा की एक शर्त है जो हमे पूरी करनी होगी और वह शर्त है परमात्मा की शरणागति। यदि जीवात्मा किसी तरह से अपने मन और बुध्दि का समर्पण परमात्मा को करदे तब लक्ष्य पूरा होने में देर नहीं है। भगवत गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं  कि -

मय्येव मन आधत्स्व मयि बुध्दिं निवेशय।
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्धवं न संशयः।।

भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि है अर्जुन अपने मन और बुध्दि  को  मुझमें ही प्रविष्ट करदे, इसमें कोई सन्देह नहीं है कि उसके बाद तू मुझमें ही निवास करेगा। फिर भगवान कहते हैं कि -

सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मदव्यपाश्रयः।
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्।।

भगवान कहते हैं कि मेरे शरणागत होने वाला मेरा भक्त सदा सब कर्म करता हुआ भी मेरी  कृपा से शाश्वत अविनाशी पद को अर्थात मेरे परमधाम को प्राप्त हो जाता है। 

Monday, April 8, 2019

टेम्प्रेचर कन्वर्शन तालिका


क्रोध पर नियंत्रण

द्रोपदी चीरहरण होने के बाद द्रोणाचार्य भीष्म के कमरे में आकर अपना दुःख प्रकट करने लगे की-

"मैं बहुत शर्मसार और दुखी हूँ की ये सब मेरी आँखों को देखना पड़ा, इस से बेहतर मैं मर जाता" वगैरह वगैरह,
जिसपर भीष्म का जवाब था की "मैं तो ये सोच रहा हूँ की जब अर्जुन हमला करेगा तो उस से कैसे निबटेंगे",
द्रोणाचार्य का सारा दुःख आश्चर्य में बदल गया, उन्होंने भीष्म से पूछा "तो क्या अर्जुन आज ही हमला कर देगा"
भीष्म का जवाब था "अगर कृष्ण उसके साथ ना होते तो वो बेशक आज ही हमला कर देता और हमारी सेना उसे यहीं महल में मार गिराती, लेकिन क्यूंकि कृष्ण उसके साथ है इसलिए वो पूरी तैयारी करके हमला करेगा, लेकिन करेगा जरूर".

ये वाकया महाभारत में कृष्ण के अपने और दूसरों के गुस्सों को काबू कर पाने की सबसे बड़ी गवाही है,
कृष्ण एक बहुत ही गुस्सैल लड़ाका थे, सभी को डर रहता था की इनसे पन्गा नहीं लेना चाहिए,  कंस से लेकर शिशुपाल और जरासंध तक कृष्ण ने ना जाने कितने बड़े बड़े राजा ठिकाने लगा दिए थे।


कृष्ण के गुस्से को दिशान्तरण करने के तीन बड़े उदाहरण है:

1. पांडव गुस्से में होते हैं, द्रौपदी सबसे ज्यादा गुस्से में होती है, द्रौपदी कसम ले लेती है की वो अपने बाल अब दुशाशन के खून से ही धोएगी, वो बार बार युद्ध के लिए हुंकार भर रही होती है, सारे पाण्डंव चुपचाप सुन रहे होते हैं,

ऐसे में कृष्ण द्रौपदी को धमकाते हुए कहते है की तुम्हारे बालों के लिए वो हस्तिनापुर की लाखों महिलाओं का सिन्दूर नहीं उजड़ने देंगे, जब तक शांति की संभावना होगी तब तक शान्ति ही स्थापित करने की कोशिश की जायेगी।

द्रौपदी ये सुनकर चुप रह जाती है।

कृष्ण को पता था की इस युद्ध और दुशाशन के खून की कीमत द्रौपदी अपने पाँचों बेटों की जान से चुकाने वाली है।

2. दूसरा मौका था, जब कृष्ण पांच गाँव मांगने कौरवों के पास जाते हैं। दुर्योधन वहीँ उन्हें ग्वाला और पता नहीं क्या क्या कहने लग जाता है। कृष्ण के साथ आये हुए थे उनके भाई सात्यकि, जो महाभारत के सबसे बड़े योद्धाओं में माने जाते हैं, कृष्ण के कुछ कहने से पहले ही सात्यकि अपनी तलवार निकाल के भरी सभा के बीच दुर्योधन की छाती पर तान देते है। पूरी सभा सन्न रह जाती है कि ये क्या हो गया, युवराज की छाती की और सभा के बीचोबीच तलवार तनी हुई है। कृष्ण तभी सात्यकि का हाथ पकड़ लेते हैं, और युद्ध की चेतावनी दे डालते हैं। सात्यकि का हस्तिनापुर के महल में खड़े होकर दुर्योधन के विरुद्ध तलवार निकालना दुर्योधन को उसकी औकात बताना था, और उसे वहीँ पर नहीं मारना उसको अपनी ताकत और साहस दोनों बताना था।
दुर्योधन की सेना चाहती तो तलवार तानने के लिए सात्यकि को वहीँ मार सकती थी, लेकिन वो लोग कुछ नहीं करते।

3. तीसरा मौका था जब भीष्म फैसला कर लेते है की वो युधिष्ठिर को गिरफ्तार करके युद्ध ख़त्म कर देंगे,
भीष्म को रोक सके ऐसा कोई योद्धा नहीं था पांडवों की सेना में, भीष्म युद्धिष्ठिर को ललकारते हुए एलान कर देते है की या तो युद्धिष्ठिर आ के उन से लडे वरना वो कुछ ही दिनों में पांडवों की पूरी सेना को अकेला मार गिराएंगे, युद्धिष्ठिर को वहाँ भेज देते तो युद्ध उसी दिन ख़त्म हो जाना था, इसलिए कृष्ण युद्ध में हथियार ना उठाने की अपनी कसम को तोड़ देते है, और सुदर्शन चक्र लेकर भीष्म के सामने आ जाते है की भीष्म ने अगर एक भी पैदल सैनिक पर हथियार उठाया तो कृष्ण उसकी गर्दन उतार देंगे। भीष्म ये देखकर हथियार नीचे डालकर हाथ जोड़कर सामने खड़े हो जाते है, लेकिन कृष्ण उन्हें नहीं मारते, क्यूंकि उन्हें अपनी ताकत का डर बनाये रखना था, नाकि युद्ध में उतरना था।

ये तीनो ही मौके कृष्ण के गुस्से और गुस्से को अपनी फायदे के तौर पर इस्तेमाल करने के बेहतरीन उदाहरण हैं। कृष्ण दुश्मन को धमकाते हैं, लेकिन उसे मारते नहीं है, वो उसे मारते तभी है जब कोई और चारा ही ना बचा हो, क्यूंकि कृष्ण को परिणाम की समझ थी। उन्हें मालूम था की एक एक पैदल सैनिक का उसके घर पर कोई इंतज़ार कर रहा है। वो ना तो द्रौपदी के गुस्से को सैनिकों की जान लेने लायक समझते है, ना ही भीष्म और सात्यकि के शौर्य को। इंसान को क्रोध करना तो चाहिए पर उस पर कृष्ण जैसा नियंत्रण भी बनाये रखना चाहिए क्योंकि क्रोध आपके लिए विजय पाने के लिये विकल्प तलाशने में मदद करता है पर नियंत्रित न होने पर हर रास्ते को बन्द भी कर देता हैं।

जय श्री कृष्ण
जय श्री राधे

परमात्मा भाग-8

भक्ति मार्ग-

साधक चाहे कर्म मार्ग का हो, ज्ञान मार्ग का हो, चाहे भक्ति मार्ग का हो, चाहे किसी भी मार्ग का साधक हो उस साधक को त्रिगुणात्मक माया प्रकृति को जीतकर ही परमात्मा तक पहुँच सकता है यह वचन अटल सत्य है । शास्त्र कहते हैं कि -

" भयं द्वितीयाभिनिवेशतः स्यादीशादपेतस्य विपर्ययोऽस्मृतिः "

कृष्ण बहिर्मुख जीव कहँ, माया करति आधीन।
ताते भूल्यो आप कहँ, बन्यो विषय - रस - मीन।।

तात्पर्य यह है कि जीव अनादिकाल से अपने स्वामी परमात्मा से बिमुख है अतएव माया ने अवसर पाकर जीवात्मा को पूर्णरूप से दबोच लिया और पूर्णतः जीव को अपने वश में कर लिया। परिणामस्वरूप जीव स्वयं को देह (शरीर) मानने लगा तथा तत्काल संसारी विषयो में आसक्त हो गया अब चाहे किसी भी मार्ग का साधक हो उसे त्रिगुणात्मक माया प्रकृति को जीतकर ही परमात्मा को प्राप्त करना होगा क्योंकि ये त्रिगुणात्मक माया प्रकृति ही ईश्वर प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा है। माया प्रकृति बहुत बड़ी शक्ति है, बड़ी बड़ी हस्तियां ब्रह्मा शंकर भी  इस माया से डरते हैं । रामायण कहती है कि -

सिव चतुरानन जेहि डेराही।
अपर जीव केहि लेखे माही।।

केवल भक्ति से ही इस प्रचण्ड माया को जीता जा सकता है अन्य किसी साधन से इस माया को नहीं जीत सकते हैं।

त्रिगुणात्मक माया प्रकृति परमात्मा की शक्ति है और परमात्मा की शक्ति पर परमात्मा  ही विजय पा सकते हैं परमात्मा के  अतिरिक्त किसी में भी इतनी हिम्मत नहीं है जो इस त्रिगुणात्मक माया प्रकृति पर विजय प्राप्त कर सके। परन्तु इस विषय पर भी विचार करना आवश्यक है कि कितने ही भक्तो ने इस त्रिगुणात्मक माया प्रकृति पर विजय प्राप्त करके ईश्वर को प्राप्त किया है ईश्वर को जाना है फिर उन्होने कैसे इस प्रचण्ड माया को जीत लिया जिस माया से ब्रह्मा, शंकर भी भयभीत होते हैं। यह माया प्रकृति परमात्मा की शक्ति होने से परमात्मा की ही बराबर शक्तिशाली है तथा परमात्मा की आज्ञा से उनकी प्रेरणा से ही यह माया प्रकृति अपना कार्य करती है। इसका सीधे - सीधे मतलब यह निकला यदि किसी भी कारण से हमारी मित्रता ईश्वर से हो जाये तो हम बड़ी आसानी से इस माया प्रकृति पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। तुलसीदास जी ने रामचरित्र मानस में लिखा है कि -

जो माया सब जगहि नचावा।
जासु चरित्र लखि काहु न पावा।।
सोई प्रभु भ्रू बिलास खगराजा।
नाच नटी इव सहित समाजा।।

जो माया सारे संसार को नचाती है जिसका चरित्र कोई जान ही नहीं पाया वही माया अपने परिवार सहित परमात्मा के एक इशारे पर नटी की तरह नाचती है और परमात्मा की आज्ञा की प्रतीक्षा करती है। अब हम इस उलझन में पड़ गये कि न तो हम भगवान को जीत सकते हैं और न माया को ही जीत सकते हैं  फिर क्या करे ?

त्रिगुणात्मक माया प्रकृति जीव के ईश्वर प्राप्ति मार्ग में महान बाधक है क्योंकि यह त्रिगुणात्मक माया प्रकृति परमात्मा और जीव के बीच स्थित है जिस कारण से मायाधीन जीव पर त्रिगुणात्मक माया प्रकृति की छाया पड़ रही है और करोड़ो प्रयत्न करने पर भी जीवात्मा को परमात्मा का दर्शन नहीं हो रहा। अब हमें ऐसा प्रयास  करना चाहिए जिससे जीव माया रूपी भवसागर को पार करके परमात्मा तक पहुँच जाए जो कि असम्भव सा लगता है। यह असम्भव  सम्भव कैसे हो इस पर कुछ विचार करते हैं। वेदशास्त्र ,पुराण , गीता, रामायण तथा महापुरुष कहते हैं कि यह त्रिगुणात्मक माया प्रकृति परमात्मा की शक्ति है और यह परमात्मा की ही आज्ञा मानती है जीव का माया पर वश नहीं चलता। स्वयं परमात्मा ही अपनी कृपा से जीवात्मा को पूर्णरूप से इस त्रिगुणात्मक माया प्रकृति से बन्धनमुक्त कर सकते हैं यही अटल सत्य है। भगवत गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि -

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।।

भगवान कहते हैं कि मेरी यह माया दैवी गुणमयी माया है और बड़ी दुरत्यय है अर्थात इससे पार पाना अत्यन्त कठिन है। जो जीवात्मा केवल मेरे ही शरण होते हैं वे जीवात्मा ही इस माया को तर जाते हैं अर्थात जो जीवात्मा पूर्णरूप से मेरी ही शरण में आ जाते हैं उस मेरे ही शरणागत जीवात्मा को स्वयं मैं इस त्रिगुणात्मक माया प्रकृति से बन्धनमुक्त करके अपने लोक की प्राप्ति करा देता हूँ। अतः निष्कर्ष यह निकला कि परमात्मा की कृपा से ही जीवात्मा माया को पार करके परमात्मा को प्राप्त कर सकता है।