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Saturday, April 6, 2019

झूठा बेटा

"मम्मी , मम्मी ! मैं उस बुढिया के साथ स्कुल नही जाउँगा ना ही उसके साथ वापस आउँगा " मेरे दस वर्ष के बेटे ने गुस्से से अपना स्कुल बैग फेकतै हुए कहा तो मैं बुरी तरह से चौंक गई !

यह क्या कह रहा है? अपनी दादी को बुढिया क्यों कह रहा है? कहाँ से सीख रहा है इतनी बदतमीजी?

मैं सोच ही रही थी कि बगल के कमरे से उसके चाचा बाहर निकले और पुछा-"क्या हुआ बेटा?"

उसने फिर कहा -"चाहे कुछ भी हो जाए मैं उस बुढिया के साथ स्कुल नहीं जाउँगा हमेशा डाँटती रहती है और मेरे दोस्त भी मुझे चिढाते हैं !"

घर के सारे लोग उसकी बात पर चकित थे
घर मे बहुत सारे लोग थे मैं और मेरे पति, दो देवर और देवरानी , एक ननद , ससुर और नौकर भी !

फिर भी मेरे बेटे को स्कुल छोडने और लाने की जिम्मेदारी उसकी दादी की ही थी पैरों मे दर्द रहता था पर पोते के प्रेम मे कभी शिकायत नही करती थी बहुत प्यार करती थी उसको क्योंकि घर का पहला पोता था।

पर अचानक बेटे के मुँह से उनके लिए ऐसे शब्द सुन कर सबको बहुत आश्चर्य हो रहा था शाम को खाने पर उसे बहुत समझाया गया पर वह अपनी जिद पर अडा रहा 


पति ने तो गुस्से मे उसे थप्पड़ भी मार दिया तब सबने तय किया कि कल से उसे स्कुल छोडने और लेने माँजी नही जाएँगी !!!

अगले दिन से कोई और उसे लाने ले जाने लगा पर मेरा मन विचलित रहने लगा कि आखिर उसने ऐसा क्यों किया?
मै उससे कुछ नाराज भी थी !

शाम का समय था मैने दुध गर्म किया और बेटे को देने के लिए उसे ढुँढने लगी मैं छत पर पहुँची तो बेटे के मुँह से मेरे बारे मे बात करते सुन कर मेरे पैर ठिठक गये...
मैं छुपकर उसकी बात सुनने लगी वह अपनी दादी के गोद मे सर रख कर कह रहा था-

"मैं जानता हूँ दादी कि मम्मी मुझसे नाराज है पर मैं क्या करता?
इतनी ज्यादा गरमी मे भी वो आपको मुझे लेने भेज देते थे ! आपके पैरों मे दर्द भी तो रहता है मैने मम्मी से कहा तो उन्होंने कहा कि दादी अपनी मरजी से जाती हैं !
दादी मैंने झुठ बोला......बहुत गलत किया पर आपको परेशानी से बचाने के लिये मुझे यही सुझा...

आप मम्मी को बोल दो मुझे माफ कर दे "

वह कहता जा रहा था और मेरे पैर तथा मन सुन्न पड़ गये थे मुझे अपने बेटे के झुठ बोलने के पीछे के बड़प्पन को महसुस कर गर्व हो रहा था....
मैने दौड कर उसे गले लगा लिया और बोली-"नहीं , बेटे तुमने कुछ गलत नही किया

हम सभी पढे लिखे नासमझो को समझाने का यही तरीका था..शाबाश... बेटा !!!

परमात्मा भाग-4

श्रीमद्भागवत महापुराण में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि :-

योगास्त्रयो मया प्रोक्ता नृणां श्रेयोविधित्सया।
ज्ञानं कर्म च भक्तिश्च नोपायोऽन्योऽस्ति कुत्रचित्।।

भगवान कहते हैं कि मैने ही वेदो में एवं अन्यत्र भी मनुष्यो का कल्याण करनेके लिए तीन प्रकार के योगों का उपदेश किया है। (1)कर्म (2) ज्ञान (3)भक्ति। मनुष्यो के परम कल्याण के लिए इनके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय कहीं नहीं है।

(1)- कर्म चार प्रकार के महापुरुषो ने बताये है। 1- कर्म धर्म 2- विकर्म 3- अकर्म 4- कर्म सन्यास।

(1)- कर्म धर्म, ऐसे कर्म धर्म वेदशास्त्रो के नियम का पालन करते हुए तो किये जाते हैं परन्तु ये कर्म भगवान को समर्पित करके नहीं किये जाते, इस लिए महापुरुष कहते हैं कि ऐसे कर्म भी नश्वर होते हैं और ऐसे कर्मो का फल भी नश्वर होता है। इसकी पुष्टि स्वयं वेदशास्त्र ही करते हैं।

इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठंनान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः।
नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेऽनुभूत्वेमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति।।

भावार्थ यह है कि वेद और स्मृति आदि शास्त्रो में सांसारिक सुखो की प्राप्ति के जितने भी साधन बताये गये हैं उन्हीं को सर्वश्रेष्ठ कल्याण के साधन मानते हैं ऐसे लोग महामूर्ख  होते हैं। अतः वे अपने पुण्य कर्मो के फलस्वरूप स्वर्गलोकतक के सुखों को भोगकर पुण्य समाप्त होने पर पुनः इस मनुष्य लोक में अथवा इससे भी नीची कुत्ता, गधा, बिल्ली, सुअर,साँप बिच्छू आदि योनियो में या रौरवादि घोर नरको में चले जाते हैं।

जो कर्म वेदशास्त्रो के नियम का पालन करते हुए तो किये जाते हैं परन्तु परमात्मा को समर्पित करके नहीं किये जाते हैं तो ऐसे कर्म भी नश्वर है और इन कर्मो का फल भी नश्वर है,इसकी पुष्टि भी वेदशास्त्रो से की गई। रामायण भी इसकी पुष्टि करती है :-

सौ सुख करमु धरमु जरि जाहु।
जो न राम पद पंकज भाऊ  ।।

भावार्थ यह है कि ऐसे कर्म धर्म और उनसे मिलने वाला सुख आग में जल जायें जिन कर्म धर्म से भगवान के चरणों में अनुराग नहीं होता। कुल मिलाकर  ऐसे कर्म धर्म हमारे किसी काम के नहीं है।

(2)- विकर्म - विकर्म ऐसे कर्म है कि जो न तो वेदशास्त्रो के नियम का पालन करते हुए किये है और न ही भगवान को समर्पित करके किये जाते हैं, ऐसे कर्मो के फल से विभिन्न नर्को की प्राप्ति होती है। ऐसे कर्मो के द्वारा जीव कीट पतंग योनियो में जाता है।

अब तक कर्म मार्ग में कर्म धर्म व विकर्म पर बहुत ही संक्षेप में चर्चा  की गई अब बिन्दू संख्या 3 अकर्म  पर चर्चा  करते हैं।

(3)- अकर्म :   वास्तव में अकर्म से ही ईश्वर प्राप्ति होती है। कर्म का मतलब है करना और अकर्म का मतलब है कुछ नहीं करना । अब आपके मन में यह प्रश्न अवश्य ही उठ रहा होगा कि जब कुछ करना ही नहीं है तो परमात्मा की प्राप्ति कैसे हो जायेगी  ?  हाँ यह बात 100 प्रतिशत सत्य है कि अकर्म से ही ईश्वर प्राप्ति होगी। यह एक गोपनीय रहस्य है। हम कर्म करते हैं तो उन कर्मो का फल मिलता है

अच्छा कर्म करेंगे तो अच्छा फल मिलेगा और पाप कर्म करेंगे तो बुरा फल मिलेगा और दोनों तरह के कर्मो का फल भोगने के लिए जन्म तो लेना ही पड़ेगा। निष्कर्ष यह निकला कि चाहे बड़े से बड़ा पुण्य कर्म करो या बड़े से बड़ा पाप कर्म करो, जन्म-मृत्यु छुटकारा नहीं मिलता और यदि न तो अच्छे कर्म करो और न बुरे कर्म करो तो न अच्छा फल मिलेगा और न बुरा फल मिलेगा और जब हमारे जीवन के खाते में  किसी भी कर्म का फल होगा  ही नहीं तो कर्म फल भोगने के लिए जन्म ही नहीं लेना पड़ेगा और जब जन्म ही नहीं होगा तो मृत्यु तो होगी ही नहीं, हो गया न जन्म-मृत्यु से छुटकारा। लेकिन भगवत गीता तो कहती है कि -

न हि कशिचतक्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत।

भावार्थ यह है कि ब्रह्मांड में कोई भी व्यक्ति एक क्षण को भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता  कर्म करना मनुष्य की मजबूरी है।

Friday, April 5, 2019

गमले के पौधे और जंगल के पौधे

बाज पक्षी जिसे हम ईगल या शाहीन भी कहते है। जिस उम्र में बाकी परिंदों के बच्चे चिचियाना सीखते है उस उम्र में एक मादा बाज अपने चूजे को पंजे में दबोच कर सबसे ऊंचा उड़ जाती है। पक्षियों की दुनिया में ऐसी Tough and tight training किसी भी ओर की नही होती।

मादा बाज अपने चूजे को लेकर लगभग 12 Km ऊपर ले जाती है। जितने ऊपर अमूमन जहाज उड़ा करते हैं और वह दूरी तय करने में मादा बाज 7 से 9 मिनट का समय लेती है।

यहां से शुरू होती है उस नन्हें चूजे की कठिन परीक्षा।

उसे अब यहां बताया जाएगा कि तू किस लिए पैदा हुआ है?

तेरी दुनिया क्या है?

तेरी ऊंचाई क्या है?

तेरा धर्म बहुत ऊंचा है

और फिर मादा बाज उसे अपने पंजों से छोड़ देती है।

धरती की ओर ऊपर से नीचे आते वक्त लगभग 1 Km उस चूजे को आभास ही नहीं होता कि उसके साथ क्या हो रहा है।

6 Km के अंतराल के आने के बाद उस चूजे के पंख जो कंजाइन से जकड़े होते है, वह खुलने लगते है।

लगभग 8 Km आने के बाद उनके पंख पूरे खुल जाते है। यह जीवन का पहला दौर होता है जब बाज का बच्चा पंख फड़फड़ाता है।

अब धरती से वह लगभग 1000 मीटर दूर है ,लेकिन अभी वह उड़ना नहीं सीख पाया है। अब धरती के बिल्कुल करीब आता है जहां से वह देख सकता है उसके स्वामित्व को।

अब उसकी दूरी धरती से महज 700/800 मीटर होती है लेकिन उसका पंख अभी इतना मजबूत नहीं हुआ है की वो उड़ सके।

धरती से लगभग 400/500 मीटर दूरी पर उसे अब लगता है कि उसके जीवन की शायद अंतिम यात्रा है। फिर अचानक से एक पंजा उसे आकर अपनी गिरफ्त मे लेता है और अपने पंखों के दरमियान समा लेता है।
यह पंजा उसकी मां का होता है जो ठीक उसके उपर चिपक कर उड़ रही होती है और उसकी यह ट्रेनिंग निरंतर चलती रहती है जब तक कि वह उड़ना नहीं सीख जाता।

यह ट्रेनिंग एक कमांडो की तरह होती है। तब जाकर दुनिया को एक बाज़ मिलता है अपने से दस गुना अधिक वजनी प्राणी का भी शिकार करता है।

हिंदी में एक कहावत है... "बाज़ के बच्चे मुँडेर पर नही उड़ते।"

बेशक अपने बच्चों को अपने से चिपका कर रखिए पर... उसे दुनियां की मुश्किलों से रूबरू कराइए, उन्हें लड़ना सिखाइए। बिना आवश्यकता के भी संघर्ष करना सिखाइए।

अपने बच्चे को राष्ट्र व धर्म की रक्षा के लिए सदैव तैयार रहना.. सिखाईये .. आसान रास्तों के लिए गद्दार मुंडेरो पर नहीं .. देशभक्ति का संकल्प लेकर एक अनन्त  ऊंचाई तक ले जायें ...

ये TV के रियलिटी शो और अंग्रेजी स्कूल की बसों ने मिलकर आपके बच्चों को "ब्रायलर मुर्गे" जैसा बना दिया है जिसके पास मजबूत टंगड़ी तो है पर चल नही सकता। वजनदार पंख तो है पर उड़ नही सकता क्योंकि...

"गमले के पौधे और जंगल के पौधे में बहुत फ़र्क होता है।"

परमात्मा भाग-3

चर्चा यह चल रही थी कि परमात्मा को कैसे प्राप्त करे, परमात्मा को कैसे जाने। यह बात भी बताई गयी कि तीन तत्व हैं जीव, माया, ब्रह्म अथवा ईश्वर। जीव और ईश्वर के बीच में त्रिगुणात्मक माया है जो हमे परमात्मा तक पहुँचने में  सबसे बड़ी बाधा है। माया परमात्मा की शक्ति है अब इस माया को पराजित करके ही हम ईश्वर तक पहुँच सकते हैं जो कि असम्भव है  क्योंकि पहले यह बताया जा चुका है आप भूले न होंगे कि जिस माया से श्रृष्टि के रचने वाले ब्रह्मा जी, श्रृष्टि का पालन पोषण करने वाले विष्णु जी, श्रृष्टि का महाप्रलय करने वाले शंकर भगवान जी, ये तीनो भी भगवान की इस माया से डरते हैं इसका मैने शास्त्रो से प्रमाण भी दिया था। अब ऐसे हालात में आप विचार करें कि हम जीव माया को कैसे जीत सकते हैं और कैसे परमात्मा तक पहुँच सकते हैं, लेकिन ऐसा हुआ है इतिहास गवाह है कि कितने ही जीवो ने माया पर विजय प्राप्त करके ईश्वर  को जाना है ईश्वर को प्राप्त किया है।

 ऐसी भगवान की माया जिससे ब्रह्मा शंकर भी भयभीत होते हैं, ऐसी माया पर कितने ही जीवो ने विजय प्राप्त की है और ईश्वर को पाया है। दरअसल माया को मायापति की कृपा से ही जीत सकते हैं इसके अतिरिक्त अन्य कोई ऐसा साधन नहीं है जो अपने बल पर माया प्रकृति पर विजय प्राप्त कर सके। तुलसीदास जी कहते हैं कि :-

सिव बिरन्च कहुँ मोहइ को है बपुरा आन।
अस जिय जान भजेहि मुनि मायापति भगवान।।

भगवान श्री कृष्ण ने स्पष्ट रूप से कहा है कि :-

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।।

प्रकृति के तीन गुणो वाली इस मेरी दैवी शक्ति को पार कर पाना कठिन ही नहीं असम्भव है। किन्तु जो जीव मेरी ही शरण में आ जाते हैं अथवा पूर्णरूप से मेरे शरणागत हो जाते हैं ऐसे उन शरणागत जीवो को मैं अपनी कृपा से माया से पार कर देता हूँ।
                   


ईश्वरचंद्र विद्यासागर

एक बालक नित्य विद्यालय पढ़ने जाता था। घर में उसकी माता थी। माँ अपने बेटे पर प्राण न्योछावर किए रहती थी, उसकी हर माँग पूरी करने में आनंद का अनुभव करती। बालक भी पढ़ने-लिखने में बड़ा तेज़ और परिश्रमी था। खेल के समय खेलता, लेकिन पढ़ने के समय पढने का ध्यान रखता।

एक दिन दरवाज़े पर किसी ने- “माई! ओ माई!” पुकारते हुए आवाज़ लगाई तो बालक हाथ में पुस्तक पकड़े हुए द्वार पर गया, देखा कि एक फटेहाल बुढ़िया काँपते हाथ फैलाए खड़ी थी।

उसने कहा- “बेटा! कुछ भीख दे दे।“

बुढ़िया के मुँह से बेटा सुनकर वह भावुक हो गया और माँ से आकर कहने लगा- “माँ! एक बेचारी गरीब माँ मुझे ‘बेटा’  कहकर कुछ माँग रही है।“

उस समय घर में कुछ खाने की चीज़ थी नहीं, इसलिए माँ ने कहा- “बेटा! रोटी-भात तो कुछ बचा नहीं है, चाहे तो चावल दे दो।“

इसपर बालक ने हठ करते हुए कहा- “माँ! चावल से क्या होगा? तुम जो अपने हाथ में सोने का कंगन पहने हो, वही दे दो न उस बेचारी को। मैं जब बड़ा होकर कमाऊँगा तो तुम्हें दो कंगन बनवा दूँगा।“

माँ ने बालक का मन रखने के लिए सच में ही सोने का अपना वह कंगन कलाई से उतारा और कहा- "लो, दे दो।"

बालक खुशी-खुशी वह कंगन उस भिखारिन को दे आया। भिखारिन को तो मानो ख़ज़ाना ही मिल गया। उसका पति अंधा था। कंगन बेचकर उसने परिवार के बच्चों के लिए अनाज, कपड़े आदि जुटा लिए। उधर वह बालक पढ़-लिखकर बड़ा विद्वान हुआ, काफ़ी नाम कमाया।

उसे बचपन का अपना वचन याद था। एक दिन वह माँ से बोला- “माँ! तुम अपने हाथ का नाप दे दो, मैं कंगन बनवा दूँ।“

पर माता ने कहा- “उसकी चिंता छोड़। मैं इतनी बूढ़ी हो गई हूँ कि अब मुझे कंगन शोभा नहीं देंगे। हाँ, कलकत्ते के तमाम ग़रीब बालक विद्यालय और चिकित्सा के लिए मारे-मारे फिरते हैं, उनके लिए तू एक विद्यालय और एक चिकित्सालय खुलवा दे जहाँ निशुल्क पढ़ाई और चिकित्सा की व्यवस्था हो।"

बेटे ने ऐसा ही किया। माँ के उस बेटे का नाम ईश्वरचंद्र विद्यासागर है।

परमात्मा भाग-2

अब तक यह बताया गया तथा वेदशास्त्रो, पुराणो आदि से प्रमाणित किया गया कि परमात्मा को कोई नहीं नहीं जान सकता है।  परन्तु वेदशास्त्र, पुराण यह भी कहते हैं कि परमात्मा को 100 प्रतिशत जाना जा सकता है और कितने ही भक्तो ने ईश्वर को जाना है, ईश्वर को प्राप्त किया है।

            आज से इसी बात पर चर्चा होगी कि परमात्मा को कैसे प्राप्त करे परमात्मा को कैसे जाने। तीन तत्व हैं (1) जीव (2)माया अथवा प्रकृति (3)ब्रह्म, जीव माया के आधीन है और माया तथा जीव ये दोनो परमात्मा के आधीन हैं। परमात्मा  जीव, माया पर शासन करता है। इसकी पुष्टि ये वेदमन्त्र करता है :-

क्षरं प्रधानममृताक्षरं हरः क्षरात्मनावीशते देव एकः ।
तस्याभिध्यानाद्योजनात्तत्वभावाद्भूश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः।।

प्रधानम् का मतलब है माया प्रकृति जो क्षर है परिवर्तन व विनाशशील है। अक्षर का मतलब है जीव जो अमृताक्षरम् अथवा अविनाशी है। क्षरात्मनावीशते देव एकः इसका मतलब है कि क्षर और अक्षर इन दोनों पर एक ईश्वर  शासन करता है।

            चूँकि जीव माया के आधीन है माया से परे होने पर ही ब्रह्मसाक्षात्कार होगा। मायाधीन जीवात्मा को ब्रह्म का दर्शन नहीं होगा।
               

Thursday, April 4, 2019

परमात्मा

बात है परमात्मा को जानने की,

शास्त्रो, वेदो से, पुराणो से  पमाणित किया गया कि परमात्मा को प्राकृतिक इंद्रीय मन वाणी बुद्धि से न तो देख सकते हैं न जान सकते हैं।

             जो इंद्रीय मन वाणी बुद्धि जिस परमात्मा के किसी एक अंश की शक्ति से अपना अपना कार्य करती हैं वही वास्तव में ब्रह्म है, जिस ब्रह्म की उपासना  हमारी प्राकृतिक इंद्रीय मन वाणी बुद्धि करती हैं वह ब्रह्म का वास्तविक स्वरूप नहीं है। जो मनुष्य यह कहते हैं कि हमने ईश्वर को जान लिया है, देखलिया है ऐसा वे अपने अहंकार वश कहते हैं, जो मनुष्य यह कहते हैं कि परमात्मा परमात्मा को प्राकृतिक इंद्रीय मन वाणी बुद्धि से परमात्मा के आदि अन्त और मध्य का पता नहीं लग सकता है वास्तव में वही मनुष्य ब्रह्म के वास्तविक स्वरूप को जानता है। इसकी पुष्टि ये वेदमन्त्र करता है -

यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः।
अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम्।।