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Sunday, July 14, 2019

परमात्मा भाग 18

भक्त जब अपना संसार व शरीर तक भगवान को समर्पण कर चुका होता है तब उसका संसार रहे या चला जाये उस पर कोई फर्क नहीं पड़ता बल्कि उस भक्त के लिए यह संसार ही भगवान का स्वरूप हो जाता है। ऐसे भक्त के लिए चलना, उठना, बैठना, स्नान करना, भोजन करना, व्यापार आदि समस्त कार्य  भजन साधना हो जाते हैं वो जो भी कार्य करता है वो भगवान की भक्ति है। भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते हैं  -

अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः।

हे अर्जुन जो मनुष्य अनन्य मन से मेरा नित्य निरन्तर चिन्तन करता है ऐसे भक्त के लिए मुझे प्राप्त करना अत्यन्त सुलभ है। भक्त को चाहिए कि मन से निरन्तर परमात्मा का चिन्तन करे और शरीर से परमात्मा की सेवा करे। जितना हो सके अधिक से अधिक वाणी से ईश्वर के गुण लीला लोगों को सुनाओ और कानों से ईश्वर की चर्चा सुनो, आँखों से भगवत सम्बन्धी ग्रन्थ पढ़ो उनके लीला धाम के दर्शन करो। गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं कि -

जिन्ह हरिकथा सुनी नहिं काना।
श्रवन रंध्र अहि भवन समाना।।

जो नहिं करइ राम गुन गाना।
जीह सो दादुर जीह समाना।।
                 
ईश्वरभक्त का अपनी इंद्रियाँ, मन, बुद्धि यहांँ तक कि अपने शरीर पर भी कोई अधिकार नहीं रहता फिर परिवार और संसार पर तो उसका अधिकार हो ही कैसे सकता है, आत्मा के अलावा उसके पास अपना कुछ भी नहीं है  और यदि कुछ है तो उस कुछ के कारण भक्ति में बड़ी बाधा उत्पन्न होगी, वास्तव में आत्मा का सम्बन्ध संसार तथा सांसारिक वस्तुओं से कोई सम्बन्ध होता ही नहीं, वो तो जबरदस्ती सम्बन्ध बनाकर जन्म-मरण का दुःख भोगना पड़ रहा है। आत्मा का सम्बन्ध केवल सिर्फ केवल परमात्मा से ही है इसलिए परमात्मा को पाकर आत्मा सदा के लिए अनन्दमय हो जाता है।सांसारिक वस्तुओं से आत्मा की तृप्ति नहीं हो सकती यदि किसी मनुष्य को ब्रह्माण्ड के बराबर सम्पत्ति मिल जाये तो वो पागल तो अवश्य हो जायेगा परन्तु शान्त नहीं हो सकता। भागवत महापुराण में भगवान कहते हैं कि -

भक्तिं लब्धवतः साधोः किमन्यदवशिष्यते।
मय्यनन्तगुणे ब्रह्मण्यानन्दानुभवात्मनि।।

भगवान कहते हैं कि मुझ  अनन्त गुण सम्पन्न सच्चिदानन्दघन ब्रह्म में भक्ति हो जाने पर फिर साधु महात्मा पुरूष को ओर कोन सी वस्तु प्राप्त  करनी बाकी रह जाती है? वह तो सदा के लिए कृतार्थ हो जाता है।
                 

परमात्मा भाग 17

रामचरित् मानस में तुलसीदास जी लिखते हैं -

भक्ति सुतन्त्र सकल सुख खानी।
बिनु सत्संग न पावहि परानी।।

भक्ति  में कोई भेद नहीं है, कोई नियम कानून नहीं है, भक्ति की प्राप्ति में न तो विद्या की आवश्यकता है, न धन की आवश्यकता है और न उच्चवर्णाश्रम, न वेदाध्यन की आवश्यकता है, न कठोर तप की आवश्यकता है, केवल सरल भाव से भगवान की अपार कृपा पर विश्वास करके उनका सतत प्रेमभाव से स्मरण करने की आवश्यकता है। भगवान की कृपा  हर वक्त प्रत्येक जीव पर हमेशा रहती है जिस प्राणी को इस पर विश्वास नहीं है वही ईश्वर कृपा से वंचित रह जाता है। श्री कृष्ण भगवान कहते हैं कि -

भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति।।

भगवान कहते हैं कि जो  सम्पूर्ण लोकों के ईश्वरों के भी ईश्वर हैं, वे बिना कारण स्वभाविक ही प्राणीमात्र का हित करने वाले हैं इस प्रकार जान व मान लेने पर प्राणी को परमशान्ति प्राप्त हो जाती है।

"लोकहानौ चिन्ता न कार्या निवेदितात्मलोकवेदत्वात् "

ईश्वर भक्त लोकहानि की चिन्ता नहीं करता क्योंकि ईश्वर भक्त अपने आपको और लौकिक, वैदिक सभी प्रकार के कर्मो को भगवान को अर्पण कर चुका है। भक्त के पास चिन्ता करने के लिए कुछ भी शेष नहीं बचा रहता सब कुछ परमात्मा को  अर्पण कर दिया। स्त्री, पुत्र, धन, जन, मान आदि पदार्थ रहें या चले  जाएं उस भक्त को इनकी कोई परवाह नहीं है, क्योंकि वह तो इन सब को पहले ही भगवान को समर्पण करके सर्वथा अकिंचन हो चुका है, फिर भक्त इनकी चिन्ता क्यों करे। अब तो भक्त के पास चिन्ता करने के लिए परमात्मा के अलावा कुछ भी नहीं है,  भक्त रात  दिन परमात्मा के बारे में ही चिन्तन करता है। भक्त को सांसारिक मोहमाया छोड़ने के लिए कुछ नहीं करना होता वो तो अपने आप ही सब छूट जाता है।

Saturday, June 22, 2019

पत्नी बार बार माँ पर आरोप लगाए जा रही थी और पति बार बार पत्नी को हद में रहने का निवेदन कर रहा था पर पत्नी चुप ही नही हो रही थी और जोर जोर से चीख चीख कर कह रही थी कि अंगूठी मेज पर से हो न हो मां जी ने ही उठाई है क्योंकि मेरे ओर तुम्हारे अलावा इस कमरे में कोई नहीं आया और अंगूठी मेने मेज पर ही धरि थी। 







बात जब पति की बर्दाश्त के बाहर हो गई 
तो उसने पत्नी के गाल पर एक जोरदार 
तमाचा दे मारा अभी तीन महीने पहले ही 
तो शादी हुई थी।

पत्नी से तमाचा सहन नही हुआ। वह घर 
छोड़कर जाने लगी और जाते जाते 
पति से एक सवाल पूछा कि तुमको 
अपनी मां पर इतना विश्वास क्यूं है..??

तब पति ने जो जवाब दिया उस जवाब 

को सुनकर दरवाजे के पीछे खड़ी मां 
ने सुना तो उसका मन भर आया पति 
ने पत्नी को बताया कि "जब वह 
छोटा था तब उसके पिताजी की मृत्यु
हो गई, मां मोहल्ले के घरों मे झाडू 
पोछा लगाकर जो कमा पाती थी 
उससे एक वक्त का खाना आता 
था मां एक थाली में मुझे 
परोस देती थी और खाली 
डिब्बे को ढककर रख देती 
थी और कहती थी मेरी 
रोटियां इस डिब्बे में है 
बेटा तू खा ले मैं भी 
हमेशा आधी रोटी 
खाकर कह देता था 
कि मां मेरा पेट भर 
गया है मुझे और 
नही खाना है।

मां ने मुझे 
मेरी झूठी 
आधी रोटी खाकर 
मुझे पाला पोसा और 
बड़ा किया है आज मैं दो 
रोटी कमाने लायक हो गया 
हूं लेकिन यह कैसे भूल सकता 
हूं कि मां ने उम्र के उस पड़ाव 
पर अपनी इच्छाओं को मारा है, 
वह मां आज उम्र के इस पड़ाव 
पर किसी अंगूठी की भूखी होगी.... 
यह मैं सोच भी नही सकता।

तुम तो तीन महीने से मेरे साथ हो 
मैंने तो मां की तपस्या को पिछले 
पच्चीस वर्षों से देखा है...

Thursday, June 20, 2019

परमात्मा भाग-16

 ईश्वर प्राप्ति हेतु शरणागति ही वो ब्रह्मास्त्र है जिसके बिना जीव ईश्वर प्राप्ति का अपना लक्ष्य नहीं पा सकता है। हमें भगवान की कथा उनकी लीलायें पढ़नी हैं, सुननी हैं, सुनानी है।  जीव या तो भगवान की शरण में जा सकता है या फिर त्रिगुणात्मक माया प्रकृति की शरण ग्रहण करनी होगी दोनों की शरणागति एक साथ नहीं हो सकती। वर्तमान में हम 100 प्रतिशत त्रिगुणात्मक माया प्रकृति की ही शरण ग्रहण किए हुए हैं । अब हमें इस त्रिगुणात्मक माया प्रकृति की शरण छोड़कर परमात्मा की शरण में जाना है इसमें सर्वप्रथम हमें अपने आप को जानने का प्रयास करना है क्योंकि जब तक हम इस स्थूल शरीर को ही अपना स्वरूप मानते रहेगें तब तक परमात्मा की ओर चलना असम्भव है। हम अपने आप को जब तक यह मानते रहेंगे कि यह भौतिक शरीर ही हमारा स्वरूप है, तब तक शरीर और संसार की कामना उत्पन्न होती रहेगीं और ये एक ऐसा रोग है जिसका इलाज केवल परमात्मा के पास ही है, संसार में इसका इलाज कहीं भी नहीं है, एक कामना पूर्ण होते ही दूसरी कामना तत्काल उत्पन्न हो जायगी इसी को माया कहते हैं, जीवात्मा अनादिकाल से इसी मायाजाल में फंसा हुआ है। अब इन कामनाऔ को छोड़ना होगा।

" बहुत तड़फाया है इन कामनाओं  ने हमको अब इन कामनाऔ को तड़फता छोड़ दो " 

हम जिसके बारे में अधिक सोचते हैं उसी से  हमारा लगाव होना प्रारम्भ होजाता है, संसार में भी ऐसा ही होता है।  भगवान श्री राम ने कहा है कि -

मम गुन गावत पुलक शरीरा।  गद गद गिरा नैन बहे नीरा।।

भगवान कहते हैं कि मेरे गुण गाते समय भक्त का हृदय रुंध जाये, वाणी गद गद हो जाय और नेत्रो से अश्रुधारा बह निकले वही भक्त मुझे प्रिय है। भगवान कहते हैं कि-

यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काड्ंक्षति।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान यः स मे प्रियः।।

भगवान कहते हैं, जो न तो कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है तथा जो शुभाशुभ सबका त्यागी है वही मेरा भक्त मुझे प्रिय है।

           
             

Monday, April 15, 2019

परमात्मा भाग-15

 ईश्वर प्राप्ति हेतु शरणागति ही वो ब्रह्मास्त्र है जिसके बिना जीव ईश्वर प्राप्ति का अपना लक्ष्य नहीं पा सकता है। मानव को भगवान की कथा उनकी लीलायें पढ़नी हैं, सुननी हैं, सुनानी है।  जीव या तो भगवान की शरण में जा सकता है या फिर त्रिगुणात्मक माया प्रकृति की शरण ग्रहण करनी होगी दोनों की शरणागति एक साथ नहीं हो सकती। वर्तमान में हम 100 प्रतिशत त्रिगुणात्मक माया प्रकृति की ही शरण ग्रहण किए हुए हैं अब हमें इस त्रिगुणात्मक माया प्रकृति की शरण छोड़कर परमात्मा की शरण में जाना है इसमें सर्वप्रथम हमें अपने आप को जानने का प्रयास करना है क्योंकि जब तक हम इस स्थूल शरीर को ही अपना स्वरूप मानते रहेगें तब तक परमात्मा की ओर चलना असम्भव है। हम अपने आप को जब तक यह मानते रहेंगे कि यह भौतिक शरीर ही हमारा स्वरूप तब तक शरीर और संसार की कामना उत्पन्न होती रहेगीं और ये एक ऐसा रोग है जिसका इलाज केवल परमात्मा के पास ही है, संसार में इसका इलाज कहीं भी नहीं है, एक कामना पूर्ण होते ही दूसरी कामना तत्काल उत्पन्न हो जायगी इसी को माया कहते हैं, जीवात्मा अनादिकाल से इसी मायाजाल में फंसा हुआ है। अब इन कामनाओ को छोड़ना होगा।
" बहुत तड़फाया है इन कामनाओ  ने हमको अब इन कामनाओ को तड़फता छोड़ दो "
           

Sunday, April 14, 2019

रिश्ते बच जाते हैं

सुबह सुबह पति पत्नी में झगड़ा हो गया,

पत्नी गुस्से मे बोली - बस, बहुत कर लिया बरदाश्त, अब एक मिनट भी तुम्हारे साथ नही रह सकती।

पति भी गुस्से मे था, बोला "मैं भी तुम्हे झेलते झेलते तंग आ चुका हुं।

पति गुस्से मे ही दफ्तर चला गया पत्नी ने अपनी मां को फ़ोन किया और बताया कि वो सब छोड़ छाड़ कर बच्चो समेत मायके आ रही है, अब और ज़्यादा नही रह सकती इस नरक मे।

मां ने कहा - बेटी बहु बन के आराम से वही बैठ, तेरी बड़ी बहन भी अपने पति से लड़कर आई थी, और इसी ज़िद्द मे तलाक लेकर बैठी हुई है, अब तुने वही ड्रामा शुरू कर दिया है, ख़बरदार जो तुने इधर कदम भी रखा तो... सुलह कर ले पति से, वो इतना बुरा भी नही है।

मां ने लाल झंडी दिखाई तो बेटी के होश ठिकाने आ गए और वो फूट फूट कर रो दी, जब रोकर थक गई तो दिल हल्का हो चुका था,

पति के साथ लड़ाई का सीन सोचा तो अपनी खुद की भी काफ़ी गलतियां नज़र आई।

मुहं हाथ धोकर फ्रेश हुई और पति के पसंद की डीश बनाना शुरू कर दी, और साथ स्पेशल खीर भी बना ली, सोचा कि शाम को पति से माफ़ी मांग लुंगी, अपना घर फिर भी अपना ही होता है।

पति शाम को जब घर आया तो पत्नी ने उसका अच्छे से स्वागत किया, जैसे सुबह कुछ हुआ ही ना हो पति को भी हैरत हुई। खाना खाने के बाद पति जब खीर खा रहा था तो बोला डिअर, कभी कभार मैं भी ज़्यादती कर जाता हूँ, तुम दिल पर मत लिया करो, इंसान हूँ, गुस्सा आ ही जाता है।

पति पत्नी का शुक्रिया अदा कर रहा था, और पत्नी दिल ही दिल मे अपनी मां को दुआएं दे रही थी, जिसकी सख़्ती ने उसको अपना फैसला बदलने पर मजबूर किया था, वरना तो जज़्बाती फैसला घर तबाह कर देता।

अगर माँ-बाप अपनी शादीशुदा बेटी की हर जायज़ नाजायज़ बात को सपोर्ट करना बंद कर दे तो रिश्ते बच जाते है।

चुनाव 2019

मैं एक सप्ताह पहले ही मायावती के चुनाव के बाद NDA में शामिल होने के बारे में फेसबुक पर एक लाइन की पोस्ट डाल चुका हूं।

बात ये है, कि कांग्रेस तो कहीं आएगी ही नही। ठगबंधन को जरूर कुछ सीट मिलेंगी लेकिन सरकार बनाने की कुब्बत ठगबंधन में नहीं होगी। मायावती ठगबंधन की बजह से 2014 से बेहतर स्थिति में होगी। अगर उसे अस्तित्व बचाये रखना है तो उसे BJP/NDA का सहारा लेना पड़ेगा और नही लेगी सहारा तो ED और CBI जिंदाबाद।

मायावती का वोटबैंक भी इस चाल से वाकिफ है, इसलिए जहां गठबंधन का उमीदवार BSP का नहीं है वहां वे भाजपा को वोट कर रहे है। इन शतरंजी चालों को मुस्लिम और यादव वोटर समझने में नाकाम रहे हैं, और उत्तरप्रदेश की अनेकों सीटों पर ठगबंधन के समाजवादी  उम्मीदवारो को केवल मुस्लिम और यादव वोट ही मिलने के कारण उन्हें करारी हार का मुंह देखना पड़ेगा तथा कोर भाजपा वोट के साथ साथ दलित वोट भी मिलने के कारण भाजपा उम्मीदवार जीत का परचम लहरायेंगे।